जिन्दगी

Poetic Periscope

“ज़िन्दगी” बदलने के लिए …

लड़ना पड़ता है..!
और आसान करने के लिए
समझना पड़ता है..!
वक़्त आपका है,चाहो तो
सोना बना लो और चाहो तो.
सोने में गुज़ार दो..!
अगर कुछ अलग करना है तो
भीड़ से हटकर चलो..!
भीड़ साहस तो देती है पर
पहचान छीन लेती है…!
मंज़िल ना मिले तब तक हिम्मत
मत हारो और ना ही ठहरो….
क्योंकि
पहाड़ से निकलने वाली नदियों ने
आज तक रास्ते में किसी से नहीं पूछा कि…
“समन्दर कितना दूर है.”

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Reality!!/हकीकत!!

pkvishvamitra

आईने भी हो गये हैं तमाम ही फिजूल अब तो

चेहरे की बुढाती हुई हालत को चिढाया करते हैं,

देखना चाहता था उनमें अपनी औकाते अदम

कम्बख्त हमेशा हकीकी सच्चाई छिपाया करते हैं,

खुद ही थी खुद को परखने की वो तमाम कोशिशें

अधूरे अरमानों को बनाकर गीत गुनगुनाया करते हैं,

इधर से चले थे उधर पहुंचकर फिर इधर ही आ गये

डबडबाती आंखों में निशाने जख्म छिपाया करते हैं,

एक पुरानी सी किताब समझकर टटोलते हैं अजीज

अश्कों की टपक से भीगा हुआ बरखा पाया करते हैं,

बस्तियां बदल गयी हैं चौराहे हुए हैं सभी अजनबी से

भीड में होकर भी मौजूद खुद को तन्हां पाया करते हैं,

समझ बदली सोच बदली ख्याला भी बदले हैं तमाम

नये जमाने की भूलभूलैंया में यूंही रास्ता जाया करते हैं,

बेमुरव्वत आईने भी तो नहीं बदल पाये हैं अपनी जात

फालतू में हम भी तो जिद के शिकार बन जाया करते हैं,

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अरमान

फूंक दिए थे अरमान जो कोशिशों की आग में

कमबख्त आज भी उनसे मेरे सपनों की महक आती है।

कुछ बरस पहले कुछ ख्वाब सजाये थे

हर कोशिश के साथ एक ख्वाब कांच सा टूट के बिखरा

कमबख्त आज भी उस कांच से मेरे ख्वाब की झलक आती है।

हारी या जीती मैं, ये खबर तो नही अभी तलक

कमबख्त मगर आज भी हर सांस के साथ आस नज़र आती है।
-Jyoti Yadav

Inspiration

I’ve missed more than 9000 shots in my career. I’ve lost almost 300 games. 26 times I’ve been trusted to take the game winning shot and missed. I’ve failed over and over and over again in my life. And that is why I succeed. —Michael Jordan

नदी का किनारा

Beautiful Creation 🙂

आफ़रीन

कुछ वक़्त पहले की बात है, अप्रैल-मई के महीनों की, बोर्ड परीक्षा के परिणाम मन लायक नहीं आए थे, और भी कई प्रवेश परीक्षाओं में चयन नहीं हुआ.. काफ़ी खीझ होने लगी थी मुझे, .. फिर मन को थोड़ा शांत किया और अपना आकलन किया | उस दौरान मेरी जो हालत थी, इस कविता के ज़रिए आपको बताता हूँ |

हर रोज़ यहाँ आ बैठता हूँ ,

ये वही नदी का किनारा है ,

जहाँ रेत के महल बनाकर ,

अपना बचपन मैंने संवारा है |

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फिर यहीँ आ बैठा हूँ ,

मगर आज हूँ थका हारा |

कल अपना जो लगता था ,

पराया लगता है वो किनारा |

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लगता है जैसे दरिया ये ,

मजाक मेरा उड़ाता हो |

मेरी हालत पर पंछी भी ,

चेहचहाकर मुझे चिढ़ाता हो |

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हर रोज़ इन किनारों पर ,

एक वृद्ध व्यक्ति नज़र आता है |

उसके तमाशे…

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पुरानी यादों की किताब

चंद लम्हों के दस्तावेज़ों के बीच आज एक पुरानी यादों की किताब खुल गई।

फूंक मार के धूल उड़ाई तो अकस्मात ही खोई हुई मेरी ज़िंदगी मिल गई।।

-Jyoti Yadav