वक़्त हूं मैं

Jyoti

अभी गुज़रा था एक मोहल्ले से तो देखा
एक मासूम अपनी माँ के मृत शरीर से लिपट कर रो रहा था

रूह कांप उठी वो नज़ारा देख कर

मन किया वापस लौट जाओ

ओर लौटा दूँ खुशियाँ उस मासूम को

मगर क्या करूँ वक़्त हूं मैं

दिल पे पत्थर रख के आगे बढ़ गया।
आगे बढ़ा गुज़रा एक शहर से तो देखा

एक नौजवान बेरोज़गारी में मायूस बैठा है

उदासी छाई उसको देख कर

मन किया दौड़ के जाऊ

ओर उसका भविष्य दिला दूँ उसको

मगर क्या करूँ थोड़ा सख्त हू मैं

आंखे बंद करके आगे बढ़ गया।
गुज़रा एक सरहद से तो देखा

जंग में जाने कुर्बान हो रही है

दिल बैठ गया इतनी नफरत देख कर

मन किया बदल दू कायनात

ओर प्यार भर दूँ इनमे

मगर क्या करूँ लाल रक्त सा हूं मैं

लड़ते जवानों के जिस्म से बह गया।

~Jyoti Yadav

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