Nirbhaya

Nobody has forgotten the Nirbhaya incident. We can’t forget even if we want.

This poem is dedicated to that innocent soul.

ना अग्नि संग जली हूं मैं

ना अस्थि संग बही हूं मैं

ना मौत से मरी हूं मैं

आज भी खड़ी हु मैं

आज भी लड़ी हूं मैं।

लुप्त हूं हवाओ में

गुप्त हूं फ़िज़ाओं में

यादों में पली हूं मैं

रातोँ में ढली हूं मैं।

आँचल मेरा छीन लिया था

चीखो को भी बांध दिया था

गौरव मेरा तोड़ दिया था

रूह को मेरी दबोच लिया था

आंसुओ को निचोड़ दिया था

आत्मा को झिंझोड़ दिया था

फिर मरता हुआ उन्होंने

सड़क पे मुझको छोड़ दिया था।

मगर

फिर भी ज़िन्दगी की तरफ मुड़ी थी मैं

हिम्मत के संग जुडी थी मैं

हर कोशिश की जंग जितने की जिंदगी से

आखरी साँस तक लड़ी थी मैं।

फिर सोचा जिस जहाँ ने जो दर्द दिया

क्यों उससे उम्मीद लगाए पड़ी हूं मैं

ढूंढने को फिर एक बेहतर जहाँ

लड़ कर भी मरी थी मैं।

अस्तित्व मेरा आज भी जिंदा है

केवल जिस्म से हीे मरी थी मैं

ना अग्नि संग जली थी मैं

ना अस्थि संग बही थी मैं

ना मौत से मरी हूं मैं

आज भी खड़ी हूं मैं

आज भी लड़ी हूं मैं।

-Jyoti Yadav

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One Reply to “Nirbhaya”

  1. Pingback: Nirbhaya – Jyoti

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