पहचान : Her identity

गुमनाम सी है पहचान उस औरत की

जो ता-उम्र घरोंदा बनाती रही।

माँ कहता है कोई उसे

पत्नी भी है किसी की वो 

बड़ी माँ है किसी की तो

बड़ी बहु है किसी की 

वो ता-उम्र रिश्ते निभाती रही

अपमान हुए उसके

बलिदान भी दिए उसने

फिर भी जिम्मेदारियों का बोझ उठती रही।

संतान को मिले एक अच्चा जीवन

आगे पढ़े और बढे

उन पर अपनी ममता लुटती रही।

जिन बहुओ को बेटो से बढ़ कर माना

उनके गुस्से और जिद्द के आगे सर झुकाती रही।

सबका भला चाहती है वो

सबका दर्द समझती है वो 

बस अपनी तकलीफों को छुपाती रही।

सहनशील रही वो हर पल

ताकि टूटने न पाए उसका घरोंदा

अपनी ख्वाहिसो को दबाती रही।

स्वार्थी है सब लोग यहाँ

हर कोई अपनी जरूरत के लिए उसे आजमाता रहा।

जब वक़्त आया उसका क़र्ज़ उतारने का 

तो हर कोई अपना दामन बचाता रहा।

ता-उम्र कमाया उसने जिस घर में 

वो घर उसके स्वाभिमान को गिराता रहा।

बेनाम हो गई उसकी ता-उम्र की मेहनत

कही खो सा गया उसके होने का वजूद

खामखा ही घरोंदा वो सजाती रही।

गुमनाम सी है पहचान उस औरत की

जो ता-उम्र घरोंदा बनती रही।

-Jyoti Yadav

Copyright ©Jyoti Yadav. All rights reserved.

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Published by

Jyoti

I am a Software Engineer by profession. I am an extrovert person who loves adventure and being happy. I keep myself and people around me motivated.. I believe in myself. I have a good power of expression. People always find me friendly within my limits.

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