मेरी अरदास

This poem is dedicated to my Father, Because this prayer is his thought.

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जब तक मेरी  सांस हो, यही मेरी अरदास हो ,

अगर हाथ जो आगे बढ़ाऊ,  तो वो लेने ना दें पे  हो,

फैले हाथ मेरा जो कभी तो, वो ईश्वर के दर पे ही हो,

बनु सहायक औरो का  मैं, ऐसी मेरी आस हो ,

जब तक मेरी  सांस हो, यही मेरी अरदास हो ।

खुद को इतना सक्षम  बनाऊ ,जीवन में आगे बढ़ता जाऊ ,

किसी को छोटा  बड़ा ना समझू ,सबको समान  द्रष्टि से देखु ,

ना  कोई अपना ना  कोई पराया, हर कोई मेरा ख़ास हो ,

जब तक मेरी  सांस हो, यही मेरी अरदास हो ।

मुस्किलो से लड़ता  जाऊ ,फिर भी आगे बढ़ता जाऊ ,

हिम्मत का साफा  बांध लिया है ,कोशिशों को भी साथ लिया है ,

ना  थकना है ना  रुकना है ,बस अब चलते जाना है ,

थक कर कभी ना  गिरने देना, यही मेरा दर्खाश्त हो ,

जब तक मेरी  सांस हो , यही मेरी अरदास हो

प्रेम भाव से मिल कर रहना है, ना कोई दूर दराज़ हो ,

न खामोशि में दबने पाए कोई, हर कोई एक आवाज़ हो ,

धन चहिये नही , दौलत चाहिए नही ,

पैसे का ना साथ हो ,

कुछ कमाऊ जो इस दुनिया में तो, वो इज़्ज़त और सम्मान हो ,

जब कोई नाम बोले मेरा तो, उसमे एक विश्वास हो ,

जब तक मेरी  सांस हो , यही मेरी अरदास हो।

अगर कभी जो नाम कमाऊ, तो मुझमे ना  अहंकार हो ,

मन का नम्र  रहू हमेशा , नियत मेरी साफ़ हो ,

अगर हाथ जो आगे बढ़ाऊ,  तो वो लेने ना दें पे  हो,

फैले हाथ मेरा जो कभी तो, वो ईश्वर के दर पे ही हो,

बनु सहायक औरो का  मैं ऐसी मेरी आस हो ,

जब तक मेरी  सांस हो, यही मेरी अरदास हो ।

                                                    ~Jyoti Yadav

Copyright ©Jyoti Yadav. All rights reserved.

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